समीक्षक के अनुसार फ़िल्म कहानी से खाली है और 90 के दशक के आर्केड की याद दिलाती है; इसे गंभीरता से लेना मुश्किल है, पर नज़रअंदाज़ करना भी।

स्रोत: द हिंदू (पुनर्लिखित)